SHAYARI

SHAYARI

मैं साया हूँ जिंदगी का, मौत से टकराऊँगा तब तक, जब तक, जिंदगी स्वयं न बन जाऊंगा ||

मेरे ज़ज्बातों का इम्तिहान न ले 
मुझे जीतने की आदत है
|

एक सवाल लेकर घूमता हूँ जवाब के इंतज़ार में शायद जवाब पता है इसलिए सवाल पूछता नहीं ||

मेरी आवारगी से उल्फत, है मेरे जीने का सबब   
 मुझे समझदार न बनाओ, यही है मेरा रब ||

मोती की जुस्तजू ने मुझसे गोता लगवाया          
तब जाके कहीं जीवन का राज समझ में आया
||

मेरी आवारगी को बदनाम न कर, ऐ आदम
इसमें तेरी तरक्की के मायने छिपे हैं ||

मेरे निशां पामाल रास्तों पे न खो जाएँ        
इसलिए नए रास्तों की खोज में निकला हूँ
||

मेरी आवारगी को मेरी बदसलूकी न समझ
 
ये है तो मैं हूँ ||

मेरी बेफिक्री को नासमझी न समझ
ये मेरी तख्लीकी सलाहिअत का आलम है ||

जिए जा रहा हूँ ज़िन्दगी की चाह में
ज़िन्दगी को रौंद कर ||
मैं साया हूँ रौशनी का, अंधेरों में छिप जाऊंगा 
यकीं न हो तो अपने आप से दूर जाकर देखो ||
एक मुद्दत के बाद मिला जो                         
मिलने पर लगा यही है वो ||
गम के साये मुझे पिघला रहे हैं 
शायद मुझे जांबाज़ बना रहे हैं ||
मेरी जन्नत मेरा सुकून है 
इन्सान की कश्मकश करती उसका खून है ||

बदलूँगा दुनिया अपनी मेहनत से                       
पर ये क्या, मेरी मेहनत ही मुझे खा गयी ||

मैंने की वफ़ा, उसने ज़फ़ा
नहीं नहीं नहीं
ग़लतफ़हमी बेवजह ||
उसका इश्क, मेरी मुट्ठी में रेत
जितना जकडू फिसला जाये ||
फिक्र के साये में बेफिक्री की आस
यही है इश्क का आगाज़ ||
मेरी आवारगी को शोहरत की तलाश है
और मुझे मेरी आवारगी की ||
मैं ज़िन्दगीकी दौड़ में पिछड़ रहा हूँ समाज के दायरों से आगे बढ़ रहा हूँ
एक कश्मकश में हूँ, शायद मैं जी रहा हूँ ||
साँस रूकती नहीं
मंजिल मिलती नहीं
और हम झुकते नहीं ||
आज फिर खड़ा हूँ, अपनी अस्थियों से निकल
जाने कौन छिड़क गया फिर से इसमें जल ||
बिछड़ भी जाए हम
तो क्या है गम
हमने बिताये थे वो लम्हे क्या है वो कम ||
रख दूँ तेरे क़दमों में आसमान
बिछा दूँ तेरी राहों में फूल
पर तू जाएगी मुझे भूल ||
तेरी चाहत में है फ़ना की जुस्तजू
पर और भी हैं जिनसे होती है गुफ्तगू ||
दुनिया भर की रस्मे उन्हें निभाने की कसमे
मेरा इश्क़ न मुकम्मल हो पायेगा इन सबमे ||
मेरे इश्क में बदनाम न हो जाए तू
इसलिए बोलता नहीं
मैं खुद न कमज़ोर पड़ जाऊं
राज़ दिल के खोलता नहीं ||
उम्र बढती रही दिल होता रहा जवां
अब क्या बताऊँ दिमाग है कहाँ ||
बेटे को अपने बना रहा हूँ समझदार
कुछ और समय नासमझी में बिता सकूँ
मेरी नाकामयाबी के आँसू मुझे पीने दो
तुम लुत्फ उठाओ  मेरी कामयाबी का ||
एक परिंदा उड़ा, शिकार हुआ
पर उसके खून के धब्बे आज भी ताज़ा हैं ||

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